कायस्थ नहीं अपितु, ब्रह्म-कायस्थ कहें-

                   ऊँ श्री गणेशाय नमः।।
                ऊँ श्री दुर्गा देव्यै नमो नमः।।

              ऊँ श्री ब्रह्मसरस्वत्यै नमो नमः।।


अपने-अपने गोत्र ऋषि, कुलदेवी, कुलदेव तथा महावीर जी को दण्डवत् प्रणाम्।

ऊँ प्रथम् पितृनारायणाय नमः।।

अपने-अपने धर्मी पूर्वजों तथा ब्रह्माण्ड के सभी धर्मी पितरों-पूर्वजों को सदा भक्तियुक्त तिलाञ्जलीयोंतर्पण। हमारा नमस्कार हो ...!!!



कायस्थ या ब्रह्मकायस्थ श्री चित्रगुप्त वंश की जय हो।

जो 'काया' (शरीर) में 'स्थ' ( स्थापित ) हो उसे काया+स्थ कहते हैं, ......नहीं!
अर्थात्, { सहस्त्र दिव्य वर्ष तपस्या उपरांत } श्री ब्रह्मा जी की काया (शरीर) से उत्पत्ति होने के कारण और ब्रह्मा जी की काया में स्थिति होने के कारण ही उन्हें 'ब्रह्मकायस्थ' नामक 'श्री चित्रगुप्त' नाम की संज्ञा दी गयी।




ऊँ यमाय धर्मराजाय श्री चित्रगुप्ताय वै नमः।।

श्रीमाँ ईरावती व श्री सुदक्षिणा माँ सहित चित्रगुप्त भगवान की व उनके ४ संयुक्त ८ सभी १२ पुत्रों की सदा हीं जय हों...।



ऊँ श्रीवसुंधरायै नमो नमः।।